Field Notes:‘मुझे अपनी पहचान बनाने का मौका मिला है’

6 May 2021
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यह साक्षात्कार कोविड-19 रिसर्च फ़ंडिंग प्रोग्राम 2020 के तहत अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा एक शोध अध्ययन के भाग के रूप में आयोजित किया गया था । यह अध्ययन महामारी के दौरान राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में फ्रंटलाइन वर्कर्स के अनुभवों का विश्लेषण करता है ।

प्रश्न: पिछले कई महीनों से आप कोविड-19 संबंधित कार्यों से जुड़ी हैं । कृपया अपने COVID-19 महामारी से जुड़े कर्तव्यों तथा सामान्य कर्तव्यों का संक्षिप्त विवरण दें ।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता: मुझे COVID-19 से संबंधित काम के लिए अपना गाँव ही आवंटित किया गया था । मेरी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी लोगों का सर्वेक्षण करना था । मुझे घर-घर जाना था, खासकर उन लोगों के यहाँ जो गाँव में बाहर से आये थे, लक्षणों की जांच करनी थी, दिशा निर्देश देने थे, और उन्हें अलग रहने का प्रोटोकॉल समझाना था ।

मैंने बच्चों को पढ़ाने की अपनी ज़िम्मेदारी भी जारी रखी थी, लेकिन क्योंकि हम उन्हें केंद्र में इकट्ठा नहीं कर सकते थे, इसीलिए मैं उनके घरों में जाकर उन्हें पढ़ाती थी । टीकाकरण तथा लोगों को राशन देने का कार्य भी घर-घर जाकर ही हुआ ।

यह मेरा काम नहीं था लेकिन फिर भी मैंने लोगों को खाद्यान्न प्राप्त करने में मदद की । ‘खाद्य सुरक्षा योजना’ के तहत लोगों के लिए गेहूं की उपलब्धता थी, लेकिन मेरे गांव में किसी को भी इसकी जानकारी नहीं थी । इसीलिए मैंने उनके आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे आवश्यक दस्तावेज़ जमा करवा कर उन्हें इस योजना का लाभ दिलवाने में मदद की ।

टेक होम राशन, टीकाकरण, और गर्भवती महिलाओं और कुपोषित बच्चों की रिपोर्ट्स भेजते रहना भी मेरी ज़िम्मेदारी थी ।

प्रश्न: अन्य फ्रंटलाइन वर्कर्स के साथ आपके संबंध कैसे हैं ? आप एक दूसरे के साथ किस तरह से तालमेल बैठाते हैं ?

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता: जो फ्रंटलाइन वर्कर्स महामारी टास्कफोर्स का हिस्सा थे उन्हें एक दूसरे के साथ तालमेल बैठाकर काम करना पड़ता था लेकिन मैं इस टास्कफोर्स का हिस्सा नहीं थी ।

नियमित टीकाकरण के दौरान एक बार जब बच्चों की संख्या ज़्यादा थी तब आशा कार्यकर्ताओं ने मेरी मदद की थी । हमने बच्चों को पाँच समूहों में बाँट दिया था ताकि टीकाकरण शिविर में अव्यवस्था न हो । जो बच्चे शिविर में आने में असमर्थ थे, उनके लिए घर-घर जाकर टीकाकरण कराने में भी आशा कार्यकर्ताओं ने मदद की थी ।

प्रश्न: क्या महामारी से जुड़े अपने कार्यों को करने के लिए आपको अपने सुपरवाइज़र से समर्थन या मदद मिलती थी ?

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता: सुपरवाइज़र से कोई मदद नहीं मिलती थी, वे कहते थे कि ‘यह आपका अपना गाँव है, आप इसे संभालना जानते हैं’ । उनके पास बहुत ज़्यादा काम था क्योंकि उन्हें महामारी टास्कफोर्स का ध्यान रखना था, वे सभी से रिपोर्ट लेते थे और अपडेट मांगते थे । इस कारण भी वे मेरे साथ फील्ड के काम में शामिल नहीं हो पाते थे ।

मैंने उन्हें रिपोर्ट भेजने में कभी देरी नहीं की, लेकिन उन्होंने मुझे आश्वासन दिया था कि अगर कभी देरी होती है, तो उसमें कोई बड़ी समस्या नहीं होगी ।

उन्होंने सभी कार्यों के समन्वय के लिए पंचायत, पटवारी, चिकित्सा अधिकारी तथा फ्रंटलाइन वर्कर्स के साथ मासिक बैठकें भी की । यह बैठकें हमारे लिए कोविड-19 प्रोटोकॉल का रिफ्रेशर सेशन भी थीं ।

प्रश्न: महामारी के दौरान आपको काम करने की प्रेरणा कहाँ से मिली ?

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता: मेरी प्रेरणा का सबसे बड़ा कारण है कि यह नौकरी मेरी आय का एकमात्र स्रोत है, इसीलिए मेरे पास इसे तत्परता से करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है ।

हालाँकि, महामारी के दौरान लोगों ने मुझे और मेरे काम को बहुत सराहा । लोग मुझे आशीर्वाद देते हैं, यह आशीर्वाद मेरे लिए किसी भी वेतन या प्रोत्साहन से ऊपर है ।

फ्रंटलाइन वर्कर होने के नाते मुझे अपना खुद का नाम बनाने का मौका मिला । शादी के बाद महिलाओं को उनके पति की पहचान से ही जाना जाता है, लेकिन इस नौकरी के कारण मुझे अपनी पहचान बनाने का भी मौका मिला ।

यह साक्षात्कार जयपुर, राजस्थान में 8 जनवरी 2021 को आयोजित किया गया  था ।

इसी तरह के और अनुभवों को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए Inside Districts platform पर जाएँ ।

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